सेक्स एजुकेशन की जरूरत

वात्स्यायन कहते हैं कि सेक्स एजुकेशन की जरूरत इंसान को है, न कि जानवरों को। वजह यह है कि जानवर एक खास मौसम में सेक्स संबंध बनाते हैं, 

जबकि इंसान हर मौसम में सेक्स करता है। अगर इंसान को सेक्स एजुकेशन की जरूरत है ही, तो क्यों न इसकी शुरुआत बचपन से ही हो जानी चाहिए, ताकि जवानी की दहलीज पार करते वक्त उसके कदम न बहकें। बच्चों के लिए सेक्स एजुकेशन की जरूरत पर डॉक्टर प्रकाश कोठारी की स्पेशल रिपोर्ट : 

सेक्स के मुद्दे पर जानवरों और इंसान में कुछ महत्वपूर्ण अंतर होते हैं। जानवरों में सेक्स की इच्छा ज्यादातर प्रजनन के लिए होती है, जबकि इंसान के केस में सेक्स का मकसद प्रजनन के साथ-साथ आनंद लेना भी होता है। जानवरों में कोई नैतिक मूल्य नहीं होते, न ही विवाह जैसी कोई संस्था होती है, लेकिन इंसान ने एक समाज की रचना की है और विवाह जैसा इंस्टिट्यूशन बनाया है। जाहिर है, इन चीजों के लिए कुछ नीति-नियम का पालन भी उसे करना होता है। 

क्यों जरूरी ?
आज समाज कितना भी पुरातनपंथी हो, लेकिन इंटरनेट, प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया जैसे माध्यम लोगों की सेक्स की इच्छा को इतना बढ़ा देते हैं कि उसे कंट्रोल करना नामुमकिन हो जाता है। नतीजा होता है, किशोरावस्था में अनचाहे गर्भ, यौन-जनित बीमारियों और यौन अपराधों की समस्या में बढ़ोतरी। सेक्स से जुड़ी गलतफहमियां और गलत धारणाएं इस स्थिति को और कठिन बना देती हैं। ऐसी बुराइयों को दूर करना है तो उसका एक ही तरीका है और वह है सेक्स एजुकेशन। सेक्स एजुकेशन का मतलब यह नहीं है कि हमें लोगों को वह चीज सिखानी है, जो वे नहीं जानते, बल्कि इसका मकसद है उन्हें ऐसा आचरण करना सिखाना, जिसके वे अभ्यस्त नहीं हैं। 

हमारे देश की कुल जनसंख्या का एक-तिहाई हिस्सा किशोर हैं। यही टीनएजर्स आगे चलकर देश संभालेंगे। इसके लिए अभी उन्हें यह ज्ञान देना देश के लिए फायदेमंद है। देश को अगर आर्थिक प्रगति करनी है तो सेक्स एजुकेशन देना बहुत जरूरी है। इसके बगैर आर्थिक प्रगति नामुमकिन है। फाइनैंस मिनिस्टर कितना भी अच्छा बजट दे दें, दो समस्याएं पूरा बजट चाट जाएंगी। पहली बढ़ती हुई जनसंख्या और दूसरी एचआईवी एड्स। ये दोनों समस्याएं देश को खा सकती हैं और इनका इलाज युद्धस्तर पर होना चाहिए। इनका इलाज करने का एकमात्र तरीका है - सेक्स एजुकेशन। आंकड़े बताते हैं कि जिन देशों में सेक्स एजुकेशन सही तरीके से दी गई है, वहां इन दोनों समस्याओं को निबटाया जा चुका है। स्वीडन इसका उदाहरण है। 

क्या है सेक्स एजुकेशन ?
यौन शिक्षा या सेक्स एजुकेशन मानव प्रजननतंत्र की आंतरिक संरचना और शरीर क्रिया का विज्ञान है। यह केवल इस बात की शिक्षा नहीं है कि बच्चे कैसे पैदा होते हैं, बल्कि इसमें गर्भधारण, गर्भनिरोध, यौन मनोविज्ञान, यौन विविधताएं और प्रेम के घटकों के बारे में जानकारी दी जाती है। इस जानकारी से मन में एक ऐसी नींव पड़ती है, जिसके आधार पर किसी शख्स का विकास एक सेहतमंद और जिम्मेदार वयस्क के रूप में होता है। सेक्स एजुकेशन किसी शख्स को अपनी सेक्सुअलिटी की पहचान देती है। 

सेक्स एजुकेशन कब  ?
सेक्स एजुकेशन की शुरुआत करने की कोई सही या गलत उम्र नहीं होती। हकीकत में देखें तो इसकी अनौपचारिक शुरुआत तो पालने से ही हो जाती है। जैसे-जैसे बच्चे का विकास होता जाता है, उसकी उम्र के मुताबिक उसे शिक्षा दी जाती है। अवचेतन में माता-पिता बच्चे के जन्म के समय से ही उसे सेक्स एजुकेशन देने लगते हैं। वे बच्चे को जिस तरह पकड़ते हैं, छूते हैं और उसके साथ व्यवहार करते हैं, उससे बच्चे में सेक्स एजुकेशन की नींव पड़ जाती है। बच्चे को यह महसूस कराना कि वह बहुत प्रिय है, आने वाली जिंदगी में सेक्स के प्रति उसके नजरिए और उसकी सेक्सुअलिटी पर गहरा असर डालता है। पैरंट्स आपस में जैसा व्यवहार करते हैं और परिवार के बीच आम जिंदगी में जिस तरह पेश आते हैं, उसी से बच्चे का आत्म-सम्मान और शारीरिक रूप-रेखा जैसी चीजें तय होती हैं। इसके अलावा बच्चे की प्रेम करने की जिज्ञासा, अंतरंगता और सुख-दुख बांटने की क्षमता पर भी गहरा असर होता है। 

अगर सेक्स एजुकेशन औपचारिक रूप से देनी हो, तो शुरुआत किशोरावस्था और यौन-व्यवहार शुरू होने से पहले ही कर देनी चाहिए। मिसाल के तौर पर लड़कों के वीर्य स्खलन से पहले और लड़कियों में मासिक धर्म शुरू होने से पहले यानी बच्चा जब आठवीं में आ जाए तभी आदर्श रूप से इस एजुकेशन की शुरुआत की जा सकती है। मोटा नियम यह है कि सेक्स एजुकेशन की शुरुआत बच्चों के सेक्सुअली मैच्योर होने से पहले ही हो जानी चाहिए। इस वक्त दिमाग सेक्स संबंधी ज्ञान को पाने लायक हो चुका होता है। यह उम्र ऐसी है, जब बदन में हॉर्मो का प्रॉडक्शन सबसे ज्यादा होता है। ज्यादा हॉर्मोन की वजह से बच्चे की सेक्स इच्छा भी ज्यादा तेज हो जाती है। सेक्स की इच्छा तेज होने की वजह से अनचाहे गर्भ, यौन-जनित बीमारियों और यौन अपराधों की समस्या में भी बढ़ावा हो सकता है। 

कैसे हो शुरुआत ?
बच्चे आमतौर पर जिज्ञासु होते हैं। सेक्स के प्रति भी उनके मन में तमाम सवाल होते हैं। अगर कोई बच्चा अपनी सेक्स संबंधी जिज्ञासा को अपने मां-बाप के सामने जाहिर नहीं करता, तो उसके मन में यह भाव हो सकता है कि उसके कुछ सवाल से उसके पैरंट्स असहज हो जाएंगे। अगर पैरंट्स सेक्स जैसे विषय पर सहज होंगे, तो बच्चे को महसूस होगा कि यह कोई ऐसा विषय नहीं है जिस पर बात करने की मनाही हो। जब कोई बच्चा किसी गर्भवती महिला को देखता है या उसे नाइट फॉल होता है तो उसके मन में 'क्या और कैसे' जैसे सवालों का अंबार लग जाता है। ऐसी स्थितियों में माता-पिता को अपने बच्चे को आश्वस्त करना चाहिए कि इन सबके बारे में उसकी जिज्ञासाएं सहज और नॉर्मल हैं। कई बार किसी पेपर या मैगजीन में बच्चे के बारे में सचित्र वर्णन या किसी विज्ञापन में बर्थ कंट्रोल के तरीकों की जानकारी बातचीत का प्रभावी स्त्रोत बन जाती है। अभिभावकों को चाहिए कि वे अपने बच्चों के साथ दोस्ताना रिश्ता कायम करें। इससे बच्चों में उनकी इमेज ऐसे पैरंट्स के रूप में बनेगी, जिन्हें वे सहजता से अपनी जिज्ञासाएं बता सकते हैं। पैरंट्स के इस नजरिये से चाहे बच्चे को पूरी यौन शिक्षा न दी जा सके, लेकिन कम-से-कम इतना तो होगा कि जब भी उनके मन में कोई सवाल उठेगा तो वे अपने पैरंट्स से आसानी से पूछ सकेंगे। 

पैरंट्स रखें ध्यान 
बच्चों में सवाल पूछने की योग्यता को प्रोत्साहित करना बेहद जरूरी है और इसे रचनात्मक जिज्ञासा के रूप में लेना चाहिए। उनके सवालों के जवाब विश्वसनीयता के साथ और उनकी उम्र के मुताबिक देने चाहिए। मुमकिन है कि पैरंट्स किसी सवाल का जवाब न दे पा रहे हों। ऐसे में वे कह सकते हैं कि 'तुमने बहुत अच्छा सवाल पूछा है पर मुझे भी इसका जवाब पता नहीं है। चलो, साथ मिलकर जवाब ढूंढते हैं।' ऐसे पैरंट्स अपने बच्चों का भरोसा जीतने में ज्यादा कामयाब होते हैं। कई बार बच्चे सीधे सवाल करते हैं। वे पूछ सकते हैं 'मैं कहां से आया हूं?' इस सवाल के जवाब की शुरुआत कुछ इस तरह करनी चाहिए 'तुम अपनी मम्मी के शरीर से आए हो। मम्मी-पापा को आपकी जरूरत थी इसलिए आपको लाया गया।' अगर बच्चा यह देखेगा कि आपने उसके सवाल पर बेरुखा व्यवहार नहीं किया, तो वह आपको ज्ञान और मार्गदर्शन के एक स्त्रोत के रूप में देखेगा। इस सवाल से जुड़ी दूसरी जानकारियां उसके बड़े होने पर उसे दी जा सकती हैं। इस वक्त बच्चे को सेक्स कैसे होता है, उसकी डिटेल समझाने की जरूरत नहीं होती। हां, हाथ से बनाए गए किसी स्केच के जरिये उसे चीजें समझाई जा सकती हैं। 

कुछ बच्चे अपने प्राइवेट अंगों को बार-बार छूते रहते हैं। पैरेंट्स को ऐसे में यह डर सताने लगता है कि कहीं बच्चा बड़े होकर ज्यादा जुनूनी न हो जाए! चाहे लड़का हो या लड़की, बच्चों का अपने प्राइवेट अंगों को छूना एक सामान्य प्रक्रिया है क्योंकि प्राइवेट अंगों से आनंद की अनुभूति जुड़ी होती है। उसे हाथ लगाने से बच्चों को आनंद मिलता है। यह आदत धीरे-धीरे खुद ही कम हो जाती है। बहरहाल इतना ध्यान जरूर दें कि कहीं उसके प्राइवेट अंगों के पास कोई लाली, खुजली, सूजन या कोई इंफेक्शन तो नहीं है। अगर ऐसा हो तो डॉक्टर से संपर्क करें। 

पैरंट्स की चिंता 
कुछ पैरंट्स को यह चिंता सताती है कि सेक्स एजुकेशन से कहीं बच्चे का नुकसान न हो जाए। ऐसी चिंताओं का कोई आधार नहीं है। उम्र के मुताबिक दी गई साइंटिफिक सेक्स एजुकेशन बच्चे को कतई नुकसान नहीं पहुंचाएगी। अलबत्ता इसकी अनदेखी करने से जरूर नुकसान हो सकता है। सभी जानते हैं कि सही ज्ञान कभी नुकसान कर ही नहीं सकता। अगर माता-पिता का जवाब बच्चे की समझ से बाहर भी हो, तो भी इससे कोई नुकसान नहीं होगा। हकीकत में इस तरह भविष्य में बातचीत का रास्ता और खुलेगा। 

अगर आपको ऐसा लगता है कि बच्चों को सेक्स एजुकेशन देने से उनके अंदर उत्तेजना बढ़ती है या उन्हें यौन-जनित बीमारियां हो सकती हैं, तो आप गलत हैं। सचाई यह है कि सेक्स एजुकेशन किसी शख्स की काम भावनाओं को उकसाती नहीं है, बल्कि उसकी जिज्ञासा को सही जानकारी द्वारा संतुष्ट करती है और अपनी सेक्सुअलिटी को पहचानने में उसकी मदद करती है। इससे टीनएजर्स में इतनी समझ विकसित हो जाती है कि वे अपने सेक्स आवेग को सही दिशा दे सकें और समलिंगी और विपरीतलिंगी विकल्पोंमें से सही और बेहतर विकल्प चुन सकें। यह एजुकेशन उन स्त्री-पुरुषों को पहचानने और समझने में भी मदद करती है, जो विकृत कामेच्छा और आवेगों वाले होते हैं। सही सेक्स एजुकेशन से साफ नजरिया विकसित होता है, जिसकी वजह से सामान्य सेक्स की समझ, भूमिका और सेक्स संबंधों को समझने में मदद मिलती है।

0 comments: