किशोरावस्था की कुछ सामान्य समस्याएँ

राह में एक पगडंडी ऐसी है, जिसे पार करना संयम, एकाग्रता व संतुलन की परीक्षा होती है, थोड़ी चूके और सीधे गर्त में। किशोरावस्था (वयःसंधि काल) जीवन की वही नाजुक पगडंडी है। बाल्यावस्था की सादगी और भोलेपन की दहलीज पार करके जब किशोरियाँ यौवनावस्था में प्रवेश करती हैं या कहिए, कली से फूल बनने की अवस्था वयःसंधि कहलाती है। उस दौर में परिवर्तनों का भूचाल आता है। 


किशोरावस्था की कुछ सामान्य समस्याएँ 

कद : 


  • किशोरियों का कद औसतन माता-पिता के कद पर आश्रित होता है, हालाँकि, पौष्टिक आहार एवं उचित व्यायाम के द्वारा इसे कुछ हद तक प्रभावित किया जा सकता है। अत्यधिक बौनापन व ऊँचा कद, दोनों ही हार्मोन की गड़बड़ी के सूचक हैं। 


वक्ष संपन्ना होना : 


  • आजकल गरिष्ठ व तेलयुक्त भोजन व जंक फूड्स के सेवन के कारण मोटापे के रहते कई किशोरियों के कम उम्र में ही वक्ष विकसित हो जाते हैं। स्तनों में थोड़ा बहुत दर्द, विशेषकर माहवारी के दौरान स्वाभाविक है। किंतु यदि कोई गठान या स्राव महसूस होता हो या १६ वर्ष तक भी विकास न हुआ हो या अनियंत्रित बढ़त हो तो डॉक्टर से अवश्य संपर्क करें। 


मासिक धर्म

  • प्रारंभ : अधिकांशतः १० से १३ वर्ष की आयु में प्रथम मासिक आ जाता है, पर यदि ८ साल के पहले प्रारंभ हो जाए या १६ साल तक भी न हो तो अपने डॉक्टर से संपर्क करें। 

रक्तस्राव : 


  • साधारणतः ४-५ दिन की अवधि में ५०-८० मिली रक्त जाता है, किंतु यदि ज्यादा मात्रा व अवधि में खून जा रहा हो या गट्टे जाते हों तो खून की कमी होने का डर बना रहता है। 


दर्द : 


  • मासिक में थोड़ा-बहुत दर्द होना स्वाभाविक है, पर यदि असहनीय दर्द हो तो डॉक्टरी परीक्षण आवश्यक है। 


चक्र : 


  • प्रायः २४ से २५ दिन का होता है, किंतु यदि अतिशीघ्र हो या ३५ दिन से अधिक विलंब हो तो यह हार्मोन की गड़बड़ी का सूचक है। 


श्वेत प्रदर : 


  • माह के मध्य में जब अंडा फूटता है या मासिक प्रारंभ होने के १-२ दिन पूर्व थूक समान स्राव जाना स्वाभाविक है, पर गाढ़ा दही समान व खुजली युक्त स्राव संक्रमण के कारण होता है। 



शरीर में आए आकस्मिक परिवर्तन न केवल शारीरिक वृद्धि व नारीत्व की नींव रखते हैं, वरन्‌ मानसिक परिवर्तनों के साथ मन में अपनी पहचान व स्वतंत्रता को लेकर एक अंतर्द्वंद्व भी छेड़ देते हैं। इन परिवर्तनों से अनभिज्ञ कई लड़कियाँ यह सोचकर परेशान हो उठती हैं कि वे किसी गंभीर बीमारी से त्रस्त तो नहीं। 
खासकर भारतीय समाज में जब अभिभावकों के पास अपनी बेटी के लिए न तो समय है न ये बातें की जाती हैं। अधिकांशतः यह उम्र ११ से १६ वर्ष तक होती है। कद में वृद्धि, स्तनों व नितंबों का उभार, यौन केश, शरीर में कांति व चेहरे पर लुनाई में वृद्धि, ये बाहरी परिवर्तनों का कारण होता है, आंतरिक रूप में डिंब-ग्रंथी का सक्रिय होकर ईस्ट्रोजन व प्रोजेस्ट्रॉन हॉरमोनों का रक्त में सक्रिय होना। 

इस दौरान जननांगों का विकास होता है व सबसे बड़ा लक्षित परिवर्तन होता है मासिक धर्म का प्रारंभ होना। इस दौरान प्रकृति नारी को माँ बनने के लिए शारीरिक व मानसिक रूप से विकसित करती है। शारीरिक बदलाव अकेले नहीं आते। इनसे जुड़े अनेक प्रश्न व भावनाएँ मन के अथाह सागर में हिलोरें लेने लगती हैं और लड़की अपनी उधेड़-बुन में खोई या तो शीशे में अपना सौंदर्य निहारा करती है या एकांत में अपने शरीर में होने वाले परिवर्तनों को बड़े रोमांच व मुग्ध भाव से देखा करती है। अक्सर वह घर से कटकर लड़कों के प्रति आकृष्ट होने लगती है और समाज से परे अपनी सहेलियों संग दबे स्वर खुसर-पुसर बतियाने लगती है। इस रोमांच और आश्चर्य मिश्रित मुग्ध भाव के साथ वह एक अनजाने भय और संकोच से भी घिर जाती है।




डॉ. सचिन, स्त्री रोग विशेषज्ञ बांबे हॉस्पिटल, इंदौर  

1 comment:

  1. mera naam anu hain, main jaipur se hu, meri shadi 10 month pehle hui hain, shadi ke 2 maonth main hi mujhe pregnancy lag gayi per ham nahi cahte the is liye timing ke 10 din main hi doctor ke ref. per medicin le li or pregnancy khatam ho gayi. ab main pregnancy chahti hu per nahi lag pa rahi hain. timing se pehle pet main bahut dard hota hain. mujhe kya karna chahiye pls bataye

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