गर्भवती है ? सदा मुस्कुराये !

महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान होने वाले मानसिक तनाव या अवसाद आने वाले शिशु के स्वास्थ्य पर बुरा असर डाल सकते हैं।

इस तनाव के प्रभाव से जन्म लेने वाले बच्चे की सेहत में असामान्यता पैदा हो सकती हैं। इसका असर बच्चे के जीवन पर लम्बे समय तक रह सकता है। थोडा बडा होने पर बच्चा अपने शरारती व्यवहार की वजह से नाक में दम कर सकता है। बहुत उछलकूद कर सकता है। सामान इधर-उधर फेंक सकता है।

मानसिक रोग विशेषज्ञ का कहना है कि गर्भ धारण करने के बाद स्त्रियों में मानसिक तनाव या अवसाद की स्थिति बिल्कुल नहीं पैदा होनी चाहिए। इससे बच्चों में मारपीट की प्रवृत्ति पैदा हो सकती है। स्कूल से शरारत व अन्य शिकायतें मिल सकती हैं। आशय यह कि गर्भवती महिलाओं को मानसिक तनाव या अवसाद होने से आने वाले शिशु में असामान्य आदतों का विकास हो सकता है।

मानसिक रोग विधा में इसे एडीएचडी कहा जाता है। यह लडके व लडकियों में समान रूप से पाया जा सकता है। एडीएचडी प्रभावित बच्चे अति चंचल बाल व्यवहार के होते हैं। ऐसे बच्चे स्थिरता और एकाग्रता वाले नहीं होते। इनकी मानसिक ऊर्जा आमतौर पर सकारात्मक बिन्दुओं पर खर्च नहीं होती।

ऐसे बच्चों के असामान्य व्यवहार को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। इसे यह कहकर नहीं टाला जाना चाहिए कि आगे चलकर ठीक हो जायेगा। इससे बचने के लिए गर्भकाल के दौरान माताओं को तनाव की स्थिति से बचना चाहिए और पूरी नींद के साथ खुशहाल एवं मनोरंजन गतिविधियों को प्राथमिकता देनी चाहिए।

अति विलक्षण बौद्धिक झमता वाले बच्चे भी आगे चलकर मानसिक बीमारी की चपेट में आ सकते हैं। अत्यन्त अल्पायु में बच्चे के पढाई, कला, खेल या अन्य क्षेत्र में अत्यन्त ही अधिक विलक्षण आगे चलकर उसकी मानसिक बीमारी का कारण बन सकते हैं। ऐसे बच्चे अपने कल्पना लोक में इतना आत्मसात होने लगते हैं कि धीरे-धीरे वे खुद से बातें करते, हंसते, क्रोधित होते या अजीबोगरीब मुद्रा बनाते नजर आने लगते हैं।

ऐसे बच्चों में वहम या शक की आशंका पैदा होने लगती है। ऐसे बच्चों में असुरक्षा की भावना पैदा होने का खतरा बना रहता है। ऐसे बच्चों में सामाजिक व्यवहार को बढावा देना चाहिए। खेलकूद व अन्य मनोरंजक क्रियाकलापों का उचित समायोजन करवाना चाहिए। भावनात्मक संवेदनशीलता व संवेगात्मक परिपक्वता का विकास किया जाना चाहिए।

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